प्रेम की शक्ति
परसों मेरे एक छात्र गुरप्रताप को पता चला कि मैं एक सामाजिक विषय पर एक वृत्तचित्र (documentary) बना रहा हूँ, तो वह बड़ा प्रभावित हुआ. वह चाहता था कि हम एक बहुत सुंदर, उच्च गुणवत्ता का वृत्तचित्र बनाएँ. इसके लिए उसने मदद की पेशकश भी की. हमें एक एक्सटर्नल मॉनिटर चाहिए था कैमरे के लिए. उसने तुरंत ₹25000 मुझे भेज दिए. गुरु प्रताप ने अपने एक मित्र, जिसकी मृत्यु दुर्घटना में हो गई थी, उसके नाम पर 4 साल पहले कटनी में एक जलाशय बनवाया था.

लेकिन कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती. बात दरअसल सन 2013 की है जब डीएवी विश्वविद्यालय में बी ए का पहला बैच आया था. गुरप्रताप इस बैच का छात्र था. पाँचवे सेमेस्टर का आख़िरी दिन था. बच्चों ने मुझसे पूछा कि अगले — और आख़िरी — सेमेस्टर में मैं उन्हें क्या पढ़ाऊँगा. मेरा उत्तर था कि मैं पाठ्यक्रम में लगे हुए किसी भी विषय से परिचित नहीं था. उन्होंने ज़िद की कि मैं कोई भी विषय उन्हें पढ़ाऊँ, बस 1 घंटे के लिए हर रोज़ उनकी कक्षा में ज़रूर आऊँ. उन दिनों पाठ्यक्रम में ऑप्शनल सब्जेक्ट के लिए सिनेमा एंड लिटरेचर देखा. बच्चों से पूछा यदि वे इसे पढ़ना चाहें. वे तुरंत तैयार हो गए. ना मैंने कभी वह विषय पढ़ा था, ना पढ़ाया था, और ना उन्हें इसके बारे में कुछ पता था. लेकिन उनका प्रेम इतना था कि वह चाहते थे बस किसी तरीक़े मैं उनसे रोज़ मिलूँ. फ़िल्म निर्माण की शुरूआत वहीं से हुई. सबसे पहली फिल्म "प्रोफेसर रिलेटिविस्ट" उन्हीं बच्चों के साथ बनाई गई. और यह सिलसिला आज तक चल रहा है.

यह उन बच्चों का शुद्ध प्रेम था जिसके कारण फ़िल्म निर्माण का इतना अनूठा विषय मेरी ज़िंदगी में आया. और साथ ही साथ सैकड़ों लोग उसमें शामिल हुए. यूँ तो मेरे जीवन में प्रेम की शक्ति की अनगिनत कहानियाँ हैं, लेकिन यह कहानी बेहद ख़ास है.